खेरेपति : नाग पंचमी को 200 साल पुराने इस मंदिर में लगता हैं सांपों का मेला
खेरेपति : नाग पंचमी को 200 साल पुराने इस मंदिर में लगता हैं सांपों का मेला
Published: Jul 28, 2017, 17:48:16 IST
कानपुर के माल रोड से लगे बाबा खेरेपति मंदिर में आज विशेष पूजा पाठ का अनुष्ठान किया जाता है। जहां नाग पंचमी में सर्पों की पूजा के साथ मंदिर में जिंदा सांपो से श्रंगार किया जाता है । इस मंदिर में पूजा के विशेष विधि-विधान है। आज के दिन मंदिर में नागों का श्रंगार होता है। दूर दूर से सपेरे अपने सांपों को लेकर यहां आते हैं। वहीं भक्त नागों का दर्शन पूजन कर अपने को सौभाग्यशाली मानते हैं। रात में नागों का विशेष तरीके से श्रंगार कर पूजन किया जाता है । मंदिर के अंदर भगवान विष्णु की शेष नाग के ऊपर खड़े हुए विशाल प्रतिमा बनी हुई है। वही बाबा भोले के ऊपर छाया किए हुए नाग देवता भी विद्यमान है। दूर दूर से आए हुए भक्त आज नाग पंचमी के दिन भगवान का आशीर्वाद लेकर विशेष श्रृंगार में हिस्सा लेते हैं।
शिवभक्त आस्था के साथ भगवान भोले को जल और दूध अर्पित करते हैं। वही नाग पंचमी के मौके पर कानपुर के इस प्राचीन मंदिर में भक्त सर्पो को दूध अर्पित करते हैं। 200 साल पुराने इस मंदिर के विषय में कई मान्यताएं और कहानियां जुड़ी हैं। मंदिर में लगने वाले सांपों के मेले में सभी सांप विषैले ही होते हैं, इनका जहर नहीं निकाला जाता है। मगर आज के दिन यह किसी भी भक्त को नुकसान भी नहीं पहुंचाते हैं।
खेरेपति मंदिर में एक मान्यता है यहां आज के दिन इच्छाधारी नाग नागिन का जोड़ा सबसे पहले आकर भगवान शिव को पूजता है। आज भी जब इस मंदिर का कपाट सुबह नाग पंचमी को खोला जाता है, तो शेषनाग के माथे पर दो फूल अर्पित किए हुए मिलते हैं। हालांकि शेषनाग के स्वरुप के बारे में किसी को जानकारी नहीं है। वर्षों पुराने इस शेषनाग मंदिर के संबंध में एक कथा भी जुड़ी हुई है।
राक्षसों के गुरू शुक्राचार्य ने अपनी बेटी देवयानी का विवाह जाजमऊ के राजा आदित्य के साथ किया था। बेटी से मिलने के लिए शुक्राचार्य अपने महल से निकले कानपुर के जिस स्थान पर उन्होंने आराम किया था उसी स्थान पर मंदिर बना है । थके हुए शुक्राचार्य़ ने उसी जगह विश्राम किया तभी उनकी आंख लग गई और स्वप्न में शेषनाग के दर्शन हुए। उनका आदेश हुआ कि यहां शिवलिंग की स्थापना की जाए और वह वहां पर वास करना चाहते थे। सपने को देखकर अचानक शुक्राचार्य की नींद टूट गई। उन्होंने शिवलिंग की स्थापना नहीं की। जिस समय पर शुक्राचार्य कानपुर आए थे वह सावन का ही महीना था। अगला सावन आते-आते शेषनाग स्वयं ही वहां पर आकर स्थापित हो गए।
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